तालिबान से रिश्ता: भारत द्वारा दमनकारी शासन के साथ संपर्क खत्म करने का मुद्दा

दमनकारी शासन के मौजूद रहने तक भारत को अफगानिस्तान के साथ संपर्क को सीमित करना चाहिए

Published - December 22, 2022 11:57 am IST

अपने एक ताजा अपमानजनक निर्णय में, तालिबान शासन ने विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राओं पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। “कैबिनेट” बैठक का यह निर्णय ऐसे उन फैसलों की श्रृंखला में से एक है जिसने 2001, जब पिछली बार तालिबान सत्ता में था, के बाद से हासिल हुई कई सामाजिक प्रगति को मटियामेट कर दिया है। इन फरमानों में अफगान स्कूली छात्राओं को कक्षा छह से ऊपर की पढ़ाई पर प्रतिबंध, नौकरी पर प्रतिबंध और जिम एवं सार्वजनिक पार्कों में महिलाओं पर प्रतिबंध, पुरुष रिश्तेदारों के बिना कहीं आने-जाने वाली महिलाओं की सार्वजनिक पिटाई शामिल है। दरअसल, दिनोंदिन क्रूर और अतार्किक होता जा रहा एक शासन देश की लगभग आधी आबादी को सार्वजनिक परिदृश्य से ओझल कर देना चाहता है। एक “समावेशी” सरकार की स्थापना सहित दोहा वार्ता के दौरान किए गए तमाम वादों से मुकरते हुए, सार्वजनिक और आधिकारिक रूप से इस किस्म का फैसला लेना इस शासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी नाक थपथपाने का एक तरीका है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब तालिबान 2.0 शासन के प्रति अपनी वर्तमान नीति की समीक्षा करनी चाहिए। भले ही कोई भी देश तालिबान को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं देता है, लेकिन कई देश इस शासन के नेताओं के साथ खुले तौर पर संपर्क रखते हैं। वहां भारत सहित एक दर्जन से अधिक देशों के राजनयिक मिशन हैं। सरकार ने अफगानिस्तान में वापस लौटने और यहां तक कि भारतीय मिशनों पर हमलों और हत्याओं के लिए जिम्मेदार सिराजुद्दीन हक्कानी जैसे मंत्रियों से मिलने के अपने फैसले पर सफाई दी है, जो भारत की सुरक्षा और सहायता के सुचारू वितरण को सुनिश्चित करने की व्यावहारिक नीति का हिस्सा थे। दरअसल, इन नीतियों ने भारत को निशाना बनाने वाले आतंकवादी समूहों सहित विभिन्न आतंकवादी संगठनों को आश्रय देने वाले तालिबान के लिए शासन में बने रहना और अधिक सुविधाजनक बना दिया है। इसके अलावा, नई दिल्ली द्वारा अफगानों के लिए सभी किस्म के वीजा रद्द करने के फैसले से भारत में शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली छात्राओं को सबसे अधिक चोट पहुंची है।

अपनी बेबसी जाहिर करने के बजाय वैश्विक समुदाय के लिए ऐसा बहुत कुछ है जो वह कर सकता है। खासकर, इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि तालिबान के साथ उठने वाले मुद्दों के केन्द्र में महिलाओं के अधिकार हैं और यह सिर्फ एक “वांछनीय” नतीजा भर नहीं है, जो अफगानिस्तान के भविष्य में वैकल्पिक होगा। वैश्विक समुदाय को अपने सरकारी ढांचे को चलाने के लिए बाहरी सहायता पर निर्भर रहने वाले तालिबान के साथ अपने संपर्क को सीमित करना चाहिए। प्रमुख राष्ट्रों को गैर-तालिबान अफगान नेताओं, खासकर अतीत में चुनी गई महिला जन-प्रतिनिधिओं, के लिए अफगानिस्तान के बाहर भी विभिन्न मंच तैयार करने चाहिए ताकि वे फिर से एकजुट एवं संगठित होकर उस अंधेरे, जिसकी तरफ तालिबान देश को धकेलने के लिए तैयार है, के खिलाफ एक वैकल्पिक दृष्टिकोण को मुखर कर सकें। एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में, भारत को पिछले वर्ष स्पष्ट तौर पर कई किस्म के अभावों से गुजरने वाले अफगानिस्तान के लोगों की खातिर अपने “दूर रहो” वाले रवैये की समीक्षा करनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोली गई बड़ी – बड़ी बातें उन तकलीफों को कम करने में कोई काम नहीं आईं हैं और यहां तक कि उन लोगों, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से एक अच्छे दोस्त के रूप में देखा गया है, के बीच भारत के हितों या सदभावना को आगे बढ़ाने में इनसे और भी कम मदद मिली है।

This editorial has been translated from English, which can be read here.

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