अंत होने का भाव: राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की रिहाई

समय से पहले रिहाई के लिए दोषियों द्वारा पछतावा एक पूर्व शर्त होनी चाहिए

November 14, 2022 12:27 pm | Updated 12:44 pm IST

राजीव गांधी हत्याकांड के शेष छह दोषियों की रिहाई उस दुखद प्रकरण के अंत होने का प्रतीक है, जो 1980 के दशक में श्रीलंका के आंतरिक संघर्ष में भारत की विनाशकारी भागीदारी के साथ शुरू हुई थी। मई 1991 में लिट्टे के नेतृत्व के आदेश पर एक आत्मघाती हमलावर द्वारा अंजाम दी गई इस हत्या ने दुराव पैदा की। हालांकि, गुजरते वक्त के साथ, दोषी पाए गए सात लोगों के लंबे कारावास ने आखिरकार आम जनता के जेहन में थोड़ी सहानुभूति पैदा की। तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने मौत की सजा पाए चार दोषियों और उम्रकैद की सजा पाए तीन दोषियों को रिहा करने के लिए अभियान चलाया। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। वर्ष 2018 में इन दोषियों को रिहा करने के तमिलनाडु की कैबिनेट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत पारित एक प्रस्ताव पर तत्कालीन राज्यपाल द्वारा लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। अंत में उन्होंने इस प्रस्ताव को केंद्र की राय के लिए भेज दिया। कोर्ट ने इस साल की शुरुआत में राज्यपाल की इस कार्रवाई का कोई संवैधानिक आधार नहीं पाया और अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ए. जी. पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया। वही लाभ अब दूसरे दोषियों को भी दिया गया है। इन दोषियों की रिहाई जहां जश्न मनाने का कोई अवसर नहीं है, वहीं कुछ मीडिया और राजनीतिक धड़ों की मान्यता के उलट, यह शोक जाहिर करने का भी मौका नहीं है। इस साजिश के मास्टरमाइंड मर चुके हैं और सिर्फ बीच के स्तर के चंद गुर्गों एवं उनके स्थानीय सहयोगियों को ही पकड़ा गया है। लिहाजा यह भावना मजबूत हुई कि 31 साल की कैद पर्याप्त सजा है।

उनकी रिहाई, दरअसल, कई खामियों से लैस लेकिन एक जीवंत कानूनी प्रणाली के तहत अपनाई गई एक उचित प्रक्रिया की तार्किक परिणति है। वर्ष 1998 में निचली अदालत द्वारा सभी 26 अभियुक्तों को मौत की सजा सुनाने के फैसले से सुप्रीम कोर्ट मुतमइन नहीं हुई। ठंडे दिमाग से किए गए सबूतों के विश्लेषण के आधार पर, 1999 में दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उनमें से 19 अभियुक्तों को साजिश के आरोपों से बरी कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी रिहाई हुई। शेष सात में से चार को मौत और तीन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। संभावित आत्मघाती हमलावरों के स्थानीय संरक्षक के रूप में इस साजिश में शामिल की गई

नलिनी को 2000 में ही सजा में बदलाव का लाभ मिल गया। ऐसा ही लिट्टे की मदद से तमिलनाडु में एक सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन का नेतृत्व करने की मंशा पालने वाले रविचंद्रन के मामले में भी किया गया। जेल व्यवस्था ने भी अपना सौम्य चेहरा दिखलाया। इन दोषियों में से अधिकांश ने नई - नई शैक्षिक योग्यताएं हासिल कर ली, जबकि कुछ साहित्यिक गतिविधियों से भी जुड़े। उनकी रिहाई कानूनी प्रक्रियाओं और वैध हिमायत के जरिए संभव हुई है। साथ ही, यह नहीं भूलना चाहिए कि पीड़ितों के परिवारों ने बहुत कुछ सहा है और इन वर्षों में शायद ही उन्हें किसी किस्म की राहत या सहानुभूति की पेशकश हुई है। इस दुखद घटना को उम्रकैद के दोषियों की समय से पहले रिहाई से संबंधित छूट प्रणाली एवं मानदंडों का नए सिरे से मूल्यांकन करने के एक मौके के तौर पर लिया जाना चाहिए। इस विशेष मामले में स्पष्ट चूक के मद्देनजर, दोषियों की तरफ से पछतावे का कुछ संकेत दिखाए जाने को समय से पहले रिहाई की एक पूर्व शर्त बनाया जाना चाहिए।

This editorial was translated from English, which can be read here.

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