महत्वपूर्ण हस्तक्षेप : नफरत की भाषा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का आदेश

नफरत फैलने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हरसंभव प्रयास करना चाहिए

October 24, 2022 11:53 am | Updated 11:56 am IST

सुप्रीम कोर्ट के पास पुलिस को किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिना फौरन कानूनी कार्रवाई करके नफरत की भाषा से निपटने के वास्ते सक्रिय होने का निर्देश देने की पर्याप्त वजहें हैं। अदालत ने पुलिस को इस निर्देश के अनुपालन में किसी किस्म की कोताही बरतने पर अवमानना कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की पुलिस को लक्षित करके दिया गया अदालत का यह आदेश उसके सामने पेश “नफरत फैलाने वाले भाषणों के अंतहीन सिलसिले” से जुड़ी एक रिट याचिका के संदर्भ में आया है। अदालत ने बढ़ते “नफरत के माहौल” का जिक्र किया है और इस किस्म की घटनाओं से निपटने के कानूनी प्रावधान होने के बावजूद ज्यादातर मामलों में निष्क्रियता दिखाए जाने पर गौर किया है। यह बिल्कुल साफ है कि केंद्र और कुछ राज्यों में समान विचारधारा वाली सरकारें सांप्रदायिक सदभाव, भाईचारे और शांति को लेकर अदालत के माफिक चिंतित नहीं हैं। दरअसल, उनमें से कुछ मिलीभगत करते हुए या तो सोची- समझी निष्क्रियता ओढ़कर या फिर बहुसंख्यकवादी तत्वों को कथित धार्मिक सभाओं में भड़काऊ भाषणों की इजाजत देकर माहौल को बिगाड़ने में योगदान दे रही हैं। सर्वोच्च अदालत का दखल इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि कई विवादास्पद धार्मिक नेता नागवार टिप्पणियां करने के बाद आसानी से बच निकल रहे हैं। इनमें से कुछ टिप्पणियां तो नरसंहार के आहवान तक में लिपटी हुई हैं। इसी पृष्ठभूमि में, अदालत ने सभी धर्मों और सामाजिक समूहों के बीच धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों को रेखांकित किया है।

यह पिछले साल के अंत में हरिद्वार में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन से जुड़ा मामला है, जिसकी सुनवाई अब अदालत द्वारा की जा रही है। यही वो सम्मेलन था जहां से ‘नफरत की भाषा’ को परवाज मिला। उस वक्त भी, अदालत ने सुधारात्मक उपाय करने को कहा था। नतीजतन, उत्तराखंड के रुड़की में स्थानीय अधिकारियों द्वारा इसी किस्म के एक और सम्मेलन पर रोक लगाई गई थी। भले ही ऐसे हस्तक्षेपों ने उस वक्त कुछ बैठकों को रोका हो, लेकिन यह कतई नहीं कहा जा सकता कि इस किस्म की बदकारियां खत्म हो गई हैं। हिंदू त्योहारों का एक विचलित करने वाला रूझान सामने आया है, जिसमें धार्मिक जुलूसों का आयोजन एक रिवाज बन गया है। अक्सर इन जुलूसों का अंत उत्तेजक व्यवहारों की वजह से सुलगने वाली झड़पों में होता है। ऐसी झड़पों या गड़बड़ियों से निपटने के नाम पर, अधिकारियों ने किसी भी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना कथित तौर पर ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों के घरों को ध्वस्त करने की कार्रवाई का सहारा लिया है। इस किस्म के घटनाक्रमों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ नए तरह के प्रतिबंधों को जन्म दिया है। मसलन, सामूहिक प्रार्थनाओं के आयोजन में अनुचित पुलिस जांच और हिंदू आयोजनों में घुसपैठ करने की कथित साजिश के नए-नए आरोप वगैरह। कुछ टेलीविजन चैनल अपने कामकाज के तरीकों से कट्टरता में लगातार इजाफा कर रहे हैं। एक तरफ प्रशासनिक पक्षपात और दूसरी तरफ सामाजिक पूर्वाग्रह के प्रसार को राष्ट्रीय मनोदशा को बिगाड़ने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती। इस दिशा में, अदालत को नफरत फैलाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाने के हरसंभव उपाय करने चाहिए।

This editorial has been translated from English, which can be read here.

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