एक निरर्थक मौका: जीएसटी परिषद की बैठक

जीएसटी परिषद के सदस्यों को अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को और ज्यादा कारगर बनाने के लिए और अधिक प्रयास करना चाहिए

Published - December 19, 2022 12:06 pm IST

छह महीने के अंतराल के बाद शनिवार को बुलाई गई बैठक में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद ने नकली चालान वाले मामलों को छोड़कर मुकदमा शुरू करने के लिए दो करोड़ रुपये की सीमा निर्धारित करने के साथ-साथ अधिकारियों की भाषा में करदाताओं द्वारा किए जाने वाले कुछ अपराधों को गैरआपराधिक करार देने के ‘परिवर्तनकारी’ कदम को मंजूरी दे दी। दांव पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं लगे होने की वजह से विवादों और करदाताओं के उत्पीड़न की संभावनाओं को कम करने के उद्देश्य से किए गए इन बदलावों को अमल में आने में थोड़ा वक्त लगेगा। केंद्र सरकार 1 फरवरी, 2023 को पेश किए जाने वाले 2023-24 के वित्त विधेयक में इन बदलावों को शामिल करने का इरादा रखती है और राज्यों की विधानसभाओं को भी अपने संबंधित जीएसटी कानूनों में संशोधन करना होगा। जहां उद्योग जगत का मानना है कि मुकदमे की सीमा को और बढ़ाया जा सकता था, वहीं इस बात को लेकर भी घोर निराशा है कि जीएसटी परिषद ने जीएसटी से जुड़े बढ़ते विवादों से निपटने के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण स्थापित करने जैसे बहुप्रतीक्षित व्यापक समाधान को दरकिनार कर दिया। इस कदम की परिकल्पना साढ़े पांच साल पहले इस नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की शुरूआत के समय की गई थी। निश्चित रूप से, इस परिषद के मंत्रियों के एक समूह द्वारा इन न्यायाधिकरणों के कामकाज के बारे में विभिन्न सिफारिशों के साथ पेश की गई एक रिपोर्ट इस बैठक के एजेंडे का हिस्सा थी, लेकिन फिलहाल ऐसे विवादों के अंबार उच्च न्यायालयों में लगते रहेंगे।

परिषद ने चुनिंदा अन्य मसलों पर फैसला लिया। पशु चारे के रूप में उपयोग की जाने वाली दालों की भूसी पर लगने वाले पांच फीसदी शुल्क को जहां खत्म कर दिया गया, वहीं फ्रायम्स और स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल्स जैसी वस्तुओं पर कर की दर को ‘स्पष्ट’ कर दिया गया। इन छिटपुट बातों को छोड़ दिया जाए, तो बड़ी बात यह रही कि न्यायाधिकरण के प्रस्ताव सहित कई अहम बातों पर तवज्जो ही नहीं दी गई। दरअसल आधे एजेंडे को छोड़ दिया गया और चर्चाओं को तीन घंटे से थोड़ा कम समय में ही समेट दिया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कुछ राज्यों के प्रतिनिधियों को अन्य ‘जरूरी कार्यों’ में भाग लेना था। यह इस लिहाज से बेहद हैरतअंगेज है कि परिषद के बैठक की 17 दिसंबर की तारीख की अधिसूचना बहुत पहले ही जारी कर दी गई थी। यह साफ नहीं हो पाया है कि कुछ राज्यों, जो अन्यथा अपने लंबित जीएसटी बकाया और अपनी राजस्व हिस्सेदारी को बेहतर करने के लिए कर-सुधारों को लेकर मुखर रहते हैं, ने उक्त शनिवार के असुविधाजनक होने की स्थिति में बैठक की तारीख को नए सिरे से निर्धारित करने की कोई मांग की थी या नहीं। जाहिर तौर पर, कुछ राज्यों के वित्त मंत्री आने वाले वर्ष के लिए अपने बजट तैयार करने में व्यस्त हैं। लेकिन केंद्रीय बजट की तैयारियां श्रीमती सीतारमण के लिए इस महत्वपूर्ण संवाद के लिए समय निकालने में आड़े नहीं आईं। शीर्ष जीएसटी प्रशासन तंत्र के प्रति कुछ राज्यों के इस लापरवाही भरे रवैये से न सिर्फ तंबाकू एवं गुटखा व्यवसाय में कर रिसाव को रोकने या तेजी से बढ़ते ऑनलाइन गेमिंग व्यवसाय के लिए कर को निर्धारित करने के प्रयासों में देरी हो रही है, बल्कि यह इस परिषद की प्रभावशीलता के लिहाज से भी नुकसानदेह है। करदाता इस किस्म के कामचलाऊ, आधे-अधूरे और ढुलमुल नतीजों से कहीं ज्यादा बेहतर के हकदार हैं।

This editorial has been translated from English, which can be read here.

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