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वादा और हकीकत: न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री के तौर पर जैसिंडा आर्डर्न का कार्यकाल

नैतिक मूल्यों पर टिकी जैसिंडा आर्डर्न की राजनीति, चुनावी कसौटी पर खरी नहीं उतरी.

January 24, 2023 12:07 pm | Updated January 26, 2023 10:13 am IST

न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री के रूप में जैसिंडा आर्डर्न के कार्यकाल में कई चुनौतियां सामने आईं। उम्र की 37वें साल में, लेबर पार्टी की यह नेता “व्यापक बदलाव” के वादे के साथ, 2017 में सत्ता में आई थी। करीब छह साल बाद अब जब वह पद छोड़ रही हैं, तो उन्हें कई बड़े संकटों से निपटने के लिए याद किया जाएगा, जैसे कि कोरोनावायरस महामारी, क्राइस्टचर्च की मस्जिदों में चरमपंथी आतंकवादी हमला और ज्वालामुखी विस्फोट। सुश्री आर्डर्न ने जिस तरह सरकार चलाई, वह सहानुभूति और नैतिक मूल्यों पर आधारित एक मॉडल था। जिस तरह उन्होंने क्राइस्टचर्च हमले को संभाला, वह इसकी एक मिसाल है। महामारी से लड़ने के प्रति उनका रवैया शुरू में ही काफी लोकप्रिय हो गया, जिसके बूते लेबर पार्टी ने 2020 के चुनाव में एकतरफा जीत हासिल की। विकसित देशों में जिन चंद मुल्कों में कोविड-19 की वजह से प्रति दस लाख पर होने वाली मौत की दर सबसे कम है, न्यूजीलैंड उनमें से एक है। जिस तरह से उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा की, उससे भी उनकी काफी तारीफ हुई। उन्होंने कहा कि उनके पास अब “करने को बहुत कुछ नहीं है” कि वह पद पर बनी रहें। यह अंदाज उन्हें दुनिया में एक अलग पहचान देता है, जहां कोई भी आसानी से अपना पद छोड़ना नहीं चाहता। सुश्री आर्डर्न के मंत्रिमंडल में पूर्व कोविड प्रतिक्रिया मंत्री और प्रधानमंत्री के संकटमोचक क्रिस हिपकिंस, अब लेबर पार्टी की ओर से 2023 के चुनाव में उनकी जगह लेंगे।

हालांकि, उनकी नेतृत्व शैली की चौतरफा प्रशंसा होती है। खासकर दुनिया के उदारवादी खेमे में वह काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या सुश्री आर्डर्न ने मतदाताओं से किए गए वादे पूरे किए? रहन-सहन के लिहाज से न्यूजीलैंड, दुनिया के सबसे महंगे देशों में से एक है। वर्ष 2017 में सुश्री आर्डर्न ने आवास संकट को दूर करने के लिए 1,00,000 घरों का निर्माण करने का वादा किया था, लेकिन बीते पांच साल में मुट्ठी भर घर ही बन पाए। मकानों की कीमत अभी भी आसमान छू रही है और मुद्रास्फीति ने लोगों के रोजमर्रा के बजट को बिगाड़ रखा है। बाल गरीबी (दुनिया के जिन विकसित देशों में बाल गरीबी की दर सबसे ज्यादा है, न्यूजीलैंड उनमें शुमार है) को दूर करने और असमानता (शीर्ष 10 फीसदी लोगों का देश के घरेलू शुद्ध मूल्य के लगभग आधे हिस्से पर कब्जा है) से निपटने के उनके वादे धराशाई हो गए। इसके अलावा, पड़ोसी देश ऑस्ट्रेलिया में अब सबकुछ खुल जाने के बाद भी न्यूजीलैंड में लॉकडाउन और कोवि डउपायों को जारी रखने की वजह से, सुश्री आर्डर्न के शुरुआती प्रशंसकों का एक तबका उनसे छिटक गया है। उनकी लोकप्रियता में आई गिरावट ने चुनाव में लेबल पार्टी की जीत की संभावनाओं को प्रभावित किया है और इसी वजह से पार्टी के भीतर भी कई लोगों ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए। दिसंबर में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक लेबर पार्टी को 33 फ़ीसदी लोगों का समर्थन मिला, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी सेंटर-राइट नेशनल पार्टी को 38 फीसदी लोगों ने अपनी पसंद बताया। इसी पृष्ठभूमि में, सुश्री आर्डर्न ने अपने इस्तीफे की घोषणा की। श्री हिपकिंस के पास बेड़ा पार लगाने और जनता के मिजाज को पलटने के लिए अब महज आठ महीने का वक्त है और यह काम काफी मुश्किल है। उन्हें सुश्री आर्डर्न की सहानुभूतिपूर्ण राजनीति को एक मजबूत आर्थिक दृष्टिकोण के साथ मिलाना चाहिए, ताकि न्यूजीलैंड की संरचनात्मक आर्थिक समस्याओं को दूर करने में मदद मिले और सामाजिक सद्भाव भी बरकरार रहे।

This editorial has been translated from English, which can be read here.

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