विवाद में लिप्तः पश्चिम बंगाल में टकराव 

राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को राजनीतिक टकराव से पीछे हटना चाहिए

Updated - July 11, 2024 11:32 am IST

Published - July 11, 2024 10:50 am IST

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस ने दो पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गयी कार्रवाई की रिपोर्ट तलब करके राजभवन एवं राज्य सरकार के बीच टकराव और बढ़ा दिया है। उन्होंने कोलकाता नगर पुलिस आयुक्त विनीत गोयल और पुलिस उपायुक्त इंदिरा मुखर्जी द्वारा अनुचित आचरण किये जाने, जैसा कि वह मानते हैं, के बारे में केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखा है। राज्यपाल इस बात से व्यथित हैं कि राजभवन की एक कर्मचारी द्वारा उनके खिलाफ की गयी कथित यौन उत्पीड़न की शिकायत की जांच के संबंध में इन अधिकारियों ने टिप्पणियां कीं। बोस को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत कानूनी कार्रवाइयों से मिली छूट के मद्देनजर, शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है, लेकिन यह विवादित मुद्दा बन गया है क्योंकि राज्यपाल का मानना है कि पुलिस अधिकारियों ने एक ऐसी जांच के बारे में बोलकर आचरण के नियमों का उल्लंघन किया है जिसे शुरू किया या जारी रखा नहीं जा सकता। उनकी बेचैनी इसलिए भी है कि उनका मानना है कि आयुक्त ने चुनाव-बाद हिंसा की शिकायत लेकर आये लोगों के एक समूह को उनसे मिलने से रोक दिया था, जबकि वह उनसे मिलने को राजी थे। राज्यपाल ने एक महिला को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र किये जाने, एक जोड़े को छड़ी से पीटे जाने और भीड़ की हिंसा की दूसरी घटनाओं के संबंध में की गयी कार्रवाई पर रिपोर्ट भी मांगी है, जो निस्संदेह एक जायज मांग है।  

अनुच्छेद 167 के तहत राज्यपाल को राज्य सरकार से सूचना मांगने का वास्तव में अधिकार है। केंद्रीय सेवा के अधिकारी जब राज्य की सेवा में होते हैं, तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई सामान्यत: राज्य सरकारों के दायरे में आती है। क्या यह कार्रवाई राज्यपाल या केंद्र सरकार के आग्रह पर शुरू की जा सकती है, यह पूरी तरह एक अलग सवाल है। बोस ने अपने खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत से जुड़ी परिस्थितियों का हवाला इस तर्क के लिए दिया है कि यह एक “गढ़ा हुआ आरोप” है, जो पुलिस द्वारा “उत्प्रेरित और सुगम बनाया गया” है। हालांकि, अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग करके एसे मुद्दों को तूल देना किसी के हित में नहीं हो सकता। ऐसे समय में जब राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच व्यक्तिगत झगड़े और संस्थागत टकराव बढ़ रहे हैं, इस घटनाक्रम को एक और गतिरोध के रूप में देखे जाने की संभावना है जो राज्यपालों द्वारा निर्वाचित सरकारों को कमजोर करने की कोशिश के तहत राजभवन के राजनीतीकरण से जुड़ा है। दोनों पक्ष बारहों महीने विवाद में लिप्त दिखायी पड़ते हैं, जो केंद्र और राज्य के बीच विरोध की भावना को दिखाता है। सबसे आम विवाद है विधेयकों के अनुमोदन को लेकर, और एक मामला जो काफी ताजा है वह इस सवाल से जुड़ा है कि नवनिर्वाचित विधायकों को पद की शपथ किसे दिलानी चाहिए। और यहां तक कि राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर दिया है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को राजनीतिक दलदल में गिरने से पहले ही अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिए।

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